Wednesday, May 29, 2019

珠峰“人山人海 ”、山道拥堵暴露的险情

社交媒体上近日流传的一张照片再次把世界最高峰珠穆朗玛推到世人眼前
珠峰告急不是一天两天的事,但今年春季登山季的状况尤其令人关注,不仅因为登顶的路上交通堵塞,还因为从登山季开始到现在,已有至少14人丧生,3人失踪。
许多登山者 在海拔8000米的高寒、缺氧条件下长时间等候,不少人出现高原病症状。
英国44岁登山者罗宾·菲舍尔5月24日成功登顶,返回营地后身体不适,后来不治身亡。
据中国媒体报道,5月22日从南坡登顶珠峰的中国北大学生王辉对记者表示自己和同伴目睹了珠峰的"拥堵",也亲身经历了排队等候之苦。他个人堵塞时间前后总共约5小时。
尼泊尔当局统计显示,仅过去一周就有9名登山者丧生,1人坠落山谷下落不明,遇难者分别来自英国、爱尔兰、印度、尼泊尔、奥地利和美国。
珠穆朗玛峰位于青藏高原中国和尼泊尔交界处,是世界最高峰。
通常每年3月到5月是珠峰登山季,气候转暖,能见度提高,雨雪天气较少。
不过,实际的冲顶时间窗口还取决于每天的气候情况,大风大雪,尤其是风力和风速,都会减少适合冲顶的时间窗口,可能导致“交通堵塞”。
据悉,今年珠峰南坡气候比往常恶劣,导致拥堵,几百人在海拔8000米以上的“死亡地带”在缺氧和严寒中排队等候,有的长达2、3小时。
通向峰顶的沿途有不少险峻地势,登山者需要承受更多体力和精神上的挑战。
尤其是希拉里台阶,只能抓着登山绳一个一个通过,每年登山旺季这里都会“拥堵”排队。
珠峰登顶途中排长队,交通堵塞,今年不是第一次。2012年,一名德国资深登山者把珠峰山坡上长长的队伍照片放到网上,一时引起热议。
拉尔夫·杜季莫维茨(
登珠峰人数逐年增多,从最初的每年几个人、几十人,到近年来几百人,带来的环境破坏和其他隐患已经引起关注。
登山的人多了,遇难的人数也相应增多。据统计,迄今为止有4800多人成功,而途中不幸丧生者超过300人。
根据历年数据,珠峰登顶死亡率大约是8%-9%。
目前珠峰上遗留着大约200具登山者遗体。
尼泊尔登山协会估计,将一具尸体从珠峰运下山大约需要4万到8万美元,还涉及到法律、行政和出入境规则等许多方面。
尸体也许会随时间推移而风化,但大量垃圾却不会。
旅游和登山业是尼泊尔的经济支柱。但登山者大量涌入,也带来了许多登山装备,在山区留下有毒垃圾和人类排泄物。
虽然当地政府和一些团体发起清理珠峰垃圾的行动,登山者也被要求把自己的垃圾带下山,但客观条件的限制意味着许多登山客留下的废物得不到清理,原封不动躺在珠峰的山坡上,比如废弃的氧气瓶、绳索、帐篷、电池和塑料制品。
关注珠峰生态的团体呼吁尼泊尔政府收紧登珠峰许可证的发放。
尼泊尔登山协会和尼泊尔徒步旅游业协会还游说当地政府加强对可再生能源的利用并建设带有基础设施的登山永久营地。
同时,他们还想推动制订一套在喜马拉雅山区通用的基本行为准则,包括禁止烧柴,禁止使用塑料。但这些规则如何实施,对违规的人怎么处罚,都不清楚。
)1992年第一次登上珠峰峰顶,后来又先后6次成功冲顶。
他对BBC表示,在高寒缺氧条件下排队很危险,可能导致下山时氧气不够而危及生命的情况。
自1953年新西兰登山者埃德蒙·希拉里从东南坡首次成功登顶,无数人追随。
1960年5月,中华人民共和国登山队员王富洲、贡布、屈银华从北坡登顶成功;1963年,美国登山队由诺曼·迪伦弗斯带领从西坡登上珠峰。
民间业余登山者要攀登珠峰必须参加登山服务公司组织的登山团。
从北坡走,中国只有一家组织登珠峰的公司,今年春季登山名额16人,收费标准每人不到46万元人民币(约6.6万美元)。
从南坡走,尼泊尔登山向导服务公司多,向导费3万美元到8万美元,许可证11000美元,再加2000美元修路费和综合联络费。
尼泊尔当局今年发放了381张登山许可,加上当地向导,估计登山人数上千。
去年包括春秋两季登山季节总共有807人成功登上珠峰峰顶,创历史最高纪录。估计今年冲顶成功人数将更多。

Monday, May 6, 2019

क्या सांसदों की जवाबदेही तय की जा सकती है?

मुसहर जाति के बच्चों को कुपोषण से बाहर निकालने की कोशिश में लगे सामाजिक कार्यकर्ता सोमारु बताते हैं कि इस जाति के लोगों को आंगनबाड़ी और आशा वर्करों की ओर से भी सही सहयोग नहीं मिल पाता है.
वह कहते हैं, "मुसहर जाति के बच्चों का कुपोषण से संघर्ष काफ़ी कठिन है. समस्या ये है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से सबल जातियों से आने वाली आंगनबाड़ी वर्कर इन लोगों के बीच समय नहीं बिताना चाहती हैं. एक मामले में मैंने एक महिला आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को ये तक कहते सुना है कि मुसहर जाति के लोगों से गंदी बदबू आती है. हमने इस मामले में शिकायत तक दर्ज कराई. अब बताएं ऐसी कार्यकर्ता इस समाज के लोगों के साथ कैसे तालमेल बिठा पाएगी? और इस तरह इस योजना से इन लोगों का क्या भला हो पाएगा?"
बीबीसी ने अपनी पड़ताल में ये भी पाया कि सामाजिक स्तर के साथ साथ बोली-भाषा, संवेदनशीलता की कमी और समाजसेवा के क्षेत्र में काम करने के लिए ज़रूरी ट्रेनिंग का अभाव भी मदद करने वाले लोगों और मदद का इंतज़ार कर रहे लोगों के बीच एक दूरी पैदा करता है.
वाराणसी की ज़िला कार्यक्रम अधिकारी मंजू देवी इस बात को स्वीकार करती हैं.
मंजू देवी बताती हैं, "ये बात सही है कि जब गांव में जाकर महिलाओं को ये बताया जाए कि आपका बच्चा कुपोषित है तो वो ये बात समझ नहीं पाती हैं. ऐसे में हम उन्हें कहते हैं कि अगर उनके बच्चा कमजोर है तो ये चिंता की बात है क्योंकि कुपोषण बच्चों के बड़े होने पर भी उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर डालता है. कुछ समय पहले तक हमारा विभाग इन मुद्दों को लेकर महिलाओं के बीच समझ विकसित करने के लिए एक चौपाल का आयोजन करता था. कुछ समय से ये कम प्रचलन में है. लेकिन ये बात सही है कि इसे लेकर लोगों में एक समझ विकसित किए जाने की ज़रूरत है."
वहीं, वाराणसी ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी वी बी सिंह भी मानते हैं कि कुपोषण एक गंभीर समस्या है.
वह कहते हैं, "वाराणसी में अति कुपोषित बच्चों का होना अत्यंत चिंता का विषय है. इसके लिए हमारे यहां आईसीडीएस मिशन के तहत काम चल रहा है. कोशिश की जा रही है कि अति कुपोषित बच्चों को जल्द से जल्द कुपोषण से बाहर निकालकर लाया जाए."
राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी के मुसाफ़िर ख़ाना क्षेत्र में रहने वाली लीलावती दुबे अति कुपोषित श्रेणी में आने वाली अपनी नातिन पलक की स्थिति को लेकर अपने सांसद राहुल गांधी और देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराज़ नज़र आती हैं.
लीलावती कहती हैं, "हमारे लिए न तो राहुल गांधी ने कुछ किया और न ही मोदी ने. ये सब नेता लोग अपना-अपना पेट पहले भरते हैं. राहुल गांधी जी हमारे नेता हैं लेकिन आज तक पूछने नहीं आए हैं कि हमारा हाल कैसा है? खा रही हो कि मर रही हो, तुम्हारे बच्चे खा रहे हैं कि मर रहे हैं. हवा के समान आते हैं और हवा की तरह चले जाते हैं. इतनी उमर हो गई आज तक दर्शन नहीं हुए."
वह कहते हैं, "किसी नेता से कुछ भी मांगने से आज तक क्या मिला है जो अब मिल जाएगा. हमारी बच्ची इतनी कमज़ोर है. पहले कभी घी वगैरा मिलता था लेकिन अब वो सब भी बंद कर दिया गया है. आप बताइए, बच्चों को घी नहीं खिलाएंगे तो मजबूत कैसे होंगे. हम तो विकलांग हैं. निजी कंपनियां तक नौकरी नहीं देती हैं. अब ऐसे में हम कैसे अपनी बच्ची को कुपोषण के पंजे से बाहर निकालें. इसे बुखार रहता है. कभी पेट दर्द रहता है. आंगनबाड़ी से भी पूरी मदद नहीं मिलती है. इसके लिए पुष्टाहार कभी मिलता है और कभी नहीं मिलता है."
बीबीसी ने अमेठी की ज़िला कार्यक्रम अधिकारी सरोजिनी देवी से कई बार संपर्क साधने की कोशिश की, लेकिन तमाम बार फोन और संदेश भेजे जाने के बाद भी उनकी ओर से किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई.
वहीं, अमेठी के डीएम राम मनोहर मिश्रा ने चुनाव आचार संहिता का हवाला देते हुए कुपोषण पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
अब से करीब तीन साल पहले अपनी नातिन ज्योति को मरते हुए देखने वालीं फूलकली देवी भी राजनीतिक नेतृत्व से निराश नज़र आती हैं.
वह कहती हैं, "कई नेता वोट मांगने की ख़ातिर हमारे द्वार तक आए. उसकी फ़ोटो भी खींच कर ले गए और आश्वासन दिया कि हम इलाज़ करा देंगे. लेकिन कुछ हुआ नहीं. साल-डेढ़ साल की उमर से ही उसका सिर बड़ा होने लगा. फिर देखते-देखते सिर काफ़ी बड़ा हो गया. खाना-लैटरीन-पेशाब सब बिस्तर पर ही कराना पड़ता था. फिर एक दिन वो हमें छोड़कर चली गई. लेकिन वो मदद नहीं आई जिसका आश्वासन हमें दिया गया था."
ऐसे में सवाल उठता है कि कुपोषण को रोकने के लिए चलाई जा रही योजनाएं कितनी प्रभावी हैं और इनकी विफलता के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.
कुपोषण निवारण के क्षेत्र में एक लंबे समय से काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता श्रुति नागवंशी इन कार्यक्रमों की विफलता के लिए नीतिगत ख़ामियों को ज़िम्मेदार मानती हैं.
नागवंशी कहती हैं, "हमें ये लगता है कि जब तक नीति के स्तर पर कोई काम नहीं होगा तब तक कोई स्थाई परिवर्तन होने वाला नहीं है. हमारे सांसदों को ये पता होना चाहिए कि उनकी संसदीय सीटों में नागरिक किस हालत में हैं. क्योंकि इन्हीं नागरिकों के दम पर देश का विकास होता है."
"भारत में विकास का मतलब सिर्फ ढांचागत विकास से ही लगाया जाता है. ये संपूर्ण विकास कैसे हो सकता है? जब तक देश के मानव संसाधन के विकास में सांसदों की भूमिका और जवाबदेही तय नहीं की जाएगी तब तक किसी भी चीज़ के लिए सिर्फ़ ज़िला स्तर अधिकारियों को ही दोषी ठहराया जाता रहेगा."