Monday, May 6, 2019

क्या सांसदों की जवाबदेही तय की जा सकती है?

मुसहर जाति के बच्चों को कुपोषण से बाहर निकालने की कोशिश में लगे सामाजिक कार्यकर्ता सोमारु बताते हैं कि इस जाति के लोगों को आंगनबाड़ी और आशा वर्करों की ओर से भी सही सहयोग नहीं मिल पाता है.
वह कहते हैं, "मुसहर जाति के बच्चों का कुपोषण से संघर्ष काफ़ी कठिन है. समस्या ये है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से सबल जातियों से आने वाली आंगनबाड़ी वर्कर इन लोगों के बीच समय नहीं बिताना चाहती हैं. एक मामले में मैंने एक महिला आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को ये तक कहते सुना है कि मुसहर जाति के लोगों से गंदी बदबू आती है. हमने इस मामले में शिकायत तक दर्ज कराई. अब बताएं ऐसी कार्यकर्ता इस समाज के लोगों के साथ कैसे तालमेल बिठा पाएगी? और इस तरह इस योजना से इन लोगों का क्या भला हो पाएगा?"
बीबीसी ने अपनी पड़ताल में ये भी पाया कि सामाजिक स्तर के साथ साथ बोली-भाषा, संवेदनशीलता की कमी और समाजसेवा के क्षेत्र में काम करने के लिए ज़रूरी ट्रेनिंग का अभाव भी मदद करने वाले लोगों और मदद का इंतज़ार कर रहे लोगों के बीच एक दूरी पैदा करता है.
वाराणसी की ज़िला कार्यक्रम अधिकारी मंजू देवी इस बात को स्वीकार करती हैं.
मंजू देवी बताती हैं, "ये बात सही है कि जब गांव में जाकर महिलाओं को ये बताया जाए कि आपका बच्चा कुपोषित है तो वो ये बात समझ नहीं पाती हैं. ऐसे में हम उन्हें कहते हैं कि अगर उनके बच्चा कमजोर है तो ये चिंता की बात है क्योंकि कुपोषण बच्चों के बड़े होने पर भी उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर डालता है. कुछ समय पहले तक हमारा विभाग इन मुद्दों को लेकर महिलाओं के बीच समझ विकसित करने के लिए एक चौपाल का आयोजन करता था. कुछ समय से ये कम प्रचलन में है. लेकिन ये बात सही है कि इसे लेकर लोगों में एक समझ विकसित किए जाने की ज़रूरत है."
वहीं, वाराणसी ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी वी बी सिंह भी मानते हैं कि कुपोषण एक गंभीर समस्या है.
वह कहते हैं, "वाराणसी में अति कुपोषित बच्चों का होना अत्यंत चिंता का विषय है. इसके लिए हमारे यहां आईसीडीएस मिशन के तहत काम चल रहा है. कोशिश की जा रही है कि अति कुपोषित बच्चों को जल्द से जल्द कुपोषण से बाहर निकालकर लाया जाए."
राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी के मुसाफ़िर ख़ाना क्षेत्र में रहने वाली लीलावती दुबे अति कुपोषित श्रेणी में आने वाली अपनी नातिन पलक की स्थिति को लेकर अपने सांसद राहुल गांधी और देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराज़ नज़र आती हैं.
लीलावती कहती हैं, "हमारे लिए न तो राहुल गांधी ने कुछ किया और न ही मोदी ने. ये सब नेता लोग अपना-अपना पेट पहले भरते हैं. राहुल गांधी जी हमारे नेता हैं लेकिन आज तक पूछने नहीं आए हैं कि हमारा हाल कैसा है? खा रही हो कि मर रही हो, तुम्हारे बच्चे खा रहे हैं कि मर रहे हैं. हवा के समान आते हैं और हवा की तरह चले जाते हैं. इतनी उमर हो गई आज तक दर्शन नहीं हुए."
वह कहते हैं, "किसी नेता से कुछ भी मांगने से आज तक क्या मिला है जो अब मिल जाएगा. हमारी बच्ची इतनी कमज़ोर है. पहले कभी घी वगैरा मिलता था लेकिन अब वो सब भी बंद कर दिया गया है. आप बताइए, बच्चों को घी नहीं खिलाएंगे तो मजबूत कैसे होंगे. हम तो विकलांग हैं. निजी कंपनियां तक नौकरी नहीं देती हैं. अब ऐसे में हम कैसे अपनी बच्ची को कुपोषण के पंजे से बाहर निकालें. इसे बुखार रहता है. कभी पेट दर्द रहता है. आंगनबाड़ी से भी पूरी मदद नहीं मिलती है. इसके लिए पुष्टाहार कभी मिलता है और कभी नहीं मिलता है."
बीबीसी ने अमेठी की ज़िला कार्यक्रम अधिकारी सरोजिनी देवी से कई बार संपर्क साधने की कोशिश की, लेकिन तमाम बार फोन और संदेश भेजे जाने के बाद भी उनकी ओर से किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई.
वहीं, अमेठी के डीएम राम मनोहर मिश्रा ने चुनाव आचार संहिता का हवाला देते हुए कुपोषण पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.
अब से करीब तीन साल पहले अपनी नातिन ज्योति को मरते हुए देखने वालीं फूलकली देवी भी राजनीतिक नेतृत्व से निराश नज़र आती हैं.
वह कहती हैं, "कई नेता वोट मांगने की ख़ातिर हमारे द्वार तक आए. उसकी फ़ोटो भी खींच कर ले गए और आश्वासन दिया कि हम इलाज़ करा देंगे. लेकिन कुछ हुआ नहीं. साल-डेढ़ साल की उमर से ही उसका सिर बड़ा होने लगा. फिर देखते-देखते सिर काफ़ी बड़ा हो गया. खाना-लैटरीन-पेशाब सब बिस्तर पर ही कराना पड़ता था. फिर एक दिन वो हमें छोड़कर चली गई. लेकिन वो मदद नहीं आई जिसका आश्वासन हमें दिया गया था."
ऐसे में सवाल उठता है कि कुपोषण को रोकने के लिए चलाई जा रही योजनाएं कितनी प्रभावी हैं और इनकी विफलता के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.
कुपोषण निवारण के क्षेत्र में एक लंबे समय से काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता श्रुति नागवंशी इन कार्यक्रमों की विफलता के लिए नीतिगत ख़ामियों को ज़िम्मेदार मानती हैं.
नागवंशी कहती हैं, "हमें ये लगता है कि जब तक नीति के स्तर पर कोई काम नहीं होगा तब तक कोई स्थाई परिवर्तन होने वाला नहीं है. हमारे सांसदों को ये पता होना चाहिए कि उनकी संसदीय सीटों में नागरिक किस हालत में हैं. क्योंकि इन्हीं नागरिकों के दम पर देश का विकास होता है."
"भारत में विकास का मतलब सिर्फ ढांचागत विकास से ही लगाया जाता है. ये संपूर्ण विकास कैसे हो सकता है? जब तक देश के मानव संसाधन के विकास में सांसदों की भूमिका और जवाबदेही तय नहीं की जाएगी तब तक किसी भी चीज़ के लिए सिर्फ़ ज़िला स्तर अधिकारियों को ही दोषी ठहराया जाता रहेगा."

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