स्टिस दीपक मिश्रा के राज्य आगमन पर रमन सिंह सरकार को बड़े बड़े
होर्डिंग्स के ज़रिए हर ख़ास ओ आम को ये बताने की क्या ज़रूरत पड़ गई कि वो
वाक़ई ख़ुश है?
इसमें जस्टिस दीपक मिश्रा कुछ नहीं कर सकते थे पर राज्य सरकार की मंशा छिपाए नहीं छिपती क्योंकि कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ के एक गंभीर मामले में वो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अदालत में अपना बचाव करने के लिए पेश हो रही है.
सिर्फ़ इसी वजह से जस्टिस मिश्रा के स्वागत में होर्डिंग्स लगाने के अर्थ बदल जाते हैं.
छह अगस्त को छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के कोंटा क्षेत्र में हुई एक कथित मुठभेड़ में राज्य सरकार ने 15 माओवादियों को मारने का दावा किया था.
एक मानवाधिकार संगठन ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है और छत्तीसगढ़ सरकार पर आम गाँव वालों को मार डालने का आरोप लगाया है.
छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे फ़र्ज़ी याचिका बताया है और फ़ैसला अब जस्टिस दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच को करना है.
अगर ऐसे होर्डिंग्स एसोसिएशन या वकीलों की कोई संस्था लगवाती तो बहुत सामान्य सी बात होती, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसा करके ख़ुद जस्टिस दीपक मिश्रा के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है.
पुरानी कहावत है कि अदालत का काम न्याय करना ही नहीं है बल्कि ये दिखाना भी है कि न्याय किया जा रहा है.
जस्टिस मिश्रा के सामने ऐसे कई मामले हैं जिनपर उन्हें न्याय भी करना है और न्याय होते हुए दिखाना भी है.
जब ऐसे मामलों की गहन सुनवाई चल रही हो तब इस विवाद से जुड़ी बीजेपी और उसकी सरकारों से उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वो सुनवाई कर रहे न्यायाधीश से दूरी बनाकर चले?
रमन सिंह की सरकार ने जस्टिस दीपक मिश्रा के स्वागत में होर्डिंग्स लगवाकर उनका स्वागत नहीं किया बल्कि न्याय की कुर्सी पर राजनीति की छाया डालने की कोशिश की है.
इमरजेंसी में इंदिरा गाँधी ने न्यायपालिका को सत्ता के लोहे से बने बूट तले दबा दिया था और — चंद अपवादों को छोड़कर — मनमाने फ़ैसले करवाए.
इमरजेंसी को इसीलिए भारतीय जनतंत्र के इतिहास की सियाह तारीख़ के तौर पर देखा जाता है और उस सियाह तारीख़ का दोहराव कोई नहीं चाहता.
इसलिए न्यायमूर्तियों को ही तय करना होगा कि वो न्याय की मूर्तियों को खंडित होने से कैसे बचाएँगे.
सुप्रीम कोर्ट और सरकार की खींचतान, समझिए आख़िर क्या चल रहा है?
चीफ़ जस्टिस को प्रो-बीजेपी या प्रो-कांग्रेस कहना कितना उचित?
इसमें जस्टिस दीपक मिश्रा कुछ नहीं कर सकते थे पर राज्य सरकार की मंशा छिपाए नहीं छिपती क्योंकि कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ के एक गंभीर मामले में वो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अदालत में अपना बचाव करने के लिए पेश हो रही है.
सिर्फ़ इसी वजह से जस्टिस मिश्रा के स्वागत में होर्डिंग्स लगाने के अर्थ बदल जाते हैं.
छह अगस्त को छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के कोंटा क्षेत्र में हुई एक कथित मुठभेड़ में राज्य सरकार ने 15 माओवादियों को मारने का दावा किया था.
एक मानवाधिकार संगठन ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है और छत्तीसगढ़ सरकार पर आम गाँव वालों को मार डालने का आरोप लगाया है.
छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे फ़र्ज़ी याचिका बताया है और फ़ैसला अब जस्टिस दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच को करना है.
अगर ऐसे होर्डिंग्स एसोसिएशन या वकीलों की कोई संस्था लगवाती तो बहुत सामान्य सी बात होती, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसा करके ख़ुद जस्टिस दीपक मिश्रा के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है.
पुरानी कहावत है कि अदालत का काम न्याय करना ही नहीं है बल्कि ये दिखाना भी है कि न्याय किया जा रहा है.
जस्टिस मिश्रा के सामने ऐसे कई मामले हैं जिनपर उन्हें न्याय भी करना है और न्याय होते हुए दिखाना भी है.
जब ऐसे मामलों की गहन सुनवाई चल रही हो तब इस विवाद से जुड़ी बीजेपी और उसकी सरकारों से उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वो सुनवाई कर रहे न्यायाधीश से दूरी बनाकर चले?
रमन सिंह की सरकार ने जस्टिस दीपक मिश्रा के स्वागत में होर्डिंग्स लगवाकर उनका स्वागत नहीं किया बल्कि न्याय की कुर्सी पर राजनीति की छाया डालने की कोशिश की है.
इमरजेंसी में इंदिरा गाँधी ने न्यायपालिका को सत्ता के लोहे से बने बूट तले दबा दिया था और — चंद अपवादों को छोड़कर — मनमाने फ़ैसले करवाए.
इमरजेंसी को इसीलिए भारतीय जनतंत्र के इतिहास की सियाह तारीख़ के तौर पर देखा जाता है और उस सियाह तारीख़ का दोहराव कोई नहीं चाहता.
इसलिए न्यायमूर्तियों को ही तय करना होगा कि वो न्याय की मूर्तियों को खंडित होने से कैसे बचाएँगे.
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चीफ़ जस्टिस को प्रो-बीजेपी या प्रो-कांग्रेस कहना कितना उचित?
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