Friday, April 12, 2019

सर्जरी जहाँ मरीज़ सब देख रहा है पर होश में नहीं

आज दक्षिण अफ्रीका का ये रेलवे स्टेशन भारतीयों के लिए एक तीर्थस्थल की तरह है. दक्षिण अफ्रीका आने वाले बहुत से भारतीय यहां गांधी को श्रद्धांजलि देने आते हैं.
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2016 में यहां आए, तो उन्होंने यहां की मेहमानों की नोटबुक में लिखा कि, 'पीटरमारित्ज़बर्ग में हुई एक घटना ने भारत के इतिहास का रुख़ ही बदल दिया.'
स्टेशन के छोटे से वेटिंग रूम में उस घटना की याद में एक म्यूज़ियम बनाया गया है. इसके ज़रिए लोगों को 1893 की सर्द रात की उस घटना की दास्तान बतायी जाती है. यहां पर उस घटना से जुड़े दस्तावेज़ और गांधी की बैरिस्टर वाली तस्वीर भी है.
ब्राइट कहते हैं कि यहां आने वाले कई भारतीयों की आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं.
पीटरमारित्ज़बर्ग स्टेशन दक्षिण अफ्रीका के क्वाज़ुलू-नटाल सूबे में पड़ता है. इसका मुख्य स्टेशन अभी भी विक्टोरिया के युग जैसा ही है. शायद वो वैसा ही दिखता है, जैसा गांधी के दौर में दिखता होगा.
जून 2018 में महात्मा गांधी के साथ हुई उस घटना की 125वीं सालगिरह पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी पीटरमारित्ज़बर्ग आई थीं. उन्होंने महात्मा गांधी के दौर सरीखी ट्रेन में पेंट्रिच से पीटरमारित्ज़बर्ग तक का सफ़र भी किया था. पीटरमारित्ज़बर्ग पहुंचने पर स्वराज ने स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लगी महात्मा गांधी की मूर्ति का अनावरण भी किया था.
इस मूर्ति को हैदराबाद के महात्मा गांधी डिजिटल म्यूज़ियम में डिज़ाइन किया गया था. इसमें गांधी को युवा बैरिस्टर के रूप में दिखाया गया है, जो सूट और टाई पहने हुए हैं. साथ ही इस मूर्ति के दूसरे रुख में उन्हें चश्मा लगाए हुए बुज़ुर्ग के तौर पर दिखाया गया है जिन्होंने धोती पहन रखी है.
दो दिन के उस कार्यक्रम में गांधी को ट्रेन से धक्का देकर उतारने की घटना का नाटकीय मंचन भी किया गया था. इसके बाद उस घटना की याद में एक दावत भी रखी गई. तब भारत का तिरंगा स्थानीय सिटी हॉल में लहराया गया था.
आज की तारीख़ में दक्षिण अफ्रीका में सबसे ज़्यादा भारतीय मूल के लोग रहते हैं. दक्षिण अफ्रीका में उनका रसूख ज़ाहिर है. आज दूसरी और तीसरी पीढ़ी के भारतीय मूल के लोग यहां कारोबार करते हैं. वो सरकारी नौकरी भी करते हैं. साथ ही भारतीय मूल के लोग खेलों में भी दक्षिण अफ्रीका की नुमाइंदगी करते हैं.
किसी भी तरह की सर्जरी से पहले डॉक्टर मरीज़ को बेहोशी की दवा देते हैं जिसे अंग्रेज़ी में एनेस्थीसिया कहते हैं.
ये दवा लेने के बाद मरीज़ को एहसास ही नहीं होता कि उसके शरीर पर कहां, क्या हुआ. लेकिन कई बार ये दवा कम असर करती है. यानी उनका दिमाग़ सोता नहीं है. सर्जरी के दौरान उन्हें एहसास होता रहता है कि कब, कहां क्या हो रहा है.
लेकिन, एनेस्थीसिया के असर की वजह से वो इस हालत में नहीं होते कि अपनी बात कह पाएं. यहां तक कि वो हाथ-पैर भी नहीं हिला-डुला पाते. ऐसे में उन्हें तकलीफ़ का गहरा एहसास होता है. ये तजुर्बा मरीज़ों में ज़िंदगी भर के लिए डर भर देता है.
रिसर्च बताती है कि हर 20 में से एक मरीज़ एनेस्थीसिया लेने के बाद भी जागरूक रहता है. लेकिन उसका शरीर हिलने-डुलने की हालत में नहीं होता.
अभी तक बिना किसी नुक़सान वाली बेहोश करने की दवा पर रिसर्च की जा रही थी. लेकिन, अब उन हालात को समझने पर भी रिसर्च शुरू हो गई है कि जिनमें मरीज़ पर बेहोशी की दवा का असर नहीं होता.
एनेस्थीसिया मेडिकल साइंस में किसी करिश्मे से कम नहीं है. बेहोश करने की बुनियादी दवाओं की खोज प्राचीन यूनान के शोधकर्ताओं ने की थी.
इससे पहले अफ़ीम और शराब देकर सर्जरी के वक़्त मरीज़ की तकलीफ़ कम करने की कोशिश की जाती थी. लेकिन इनके नतीजे स्थायी और तसल्लीबख़्श नहीं थे.
1840 में वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसी दवाएं खोज निकालीं जिनका असर ज़्यादा था. इनमें सलफ़्यूरिक ईथर ने रिसर्चर को सबसे ज़्यादा आकर्षित किया.
1846 में अमरीका के मैसाचुसेट्स जनरस हॉस्पिटल में सबसे पहले इसका इस्तेमाल हुआ.
हालांकि इस बार भी मरीज़ पूरी तरह बेहोश नहीं था. उसे पता था कि उसके शरीर पर कहां कट लग रहा है. लेकिन, उसका दर्द का एहसास कम हो गया था.
कुल मिलाकर ये तजुर्बा कामयाब रहा और यहीं से एनेस्थीसिया की शुरुआत हुई. आज बाज़ार में दर्द और होश कंट्रोल करने वाली बहुत-सी दवाएं उपलब्ध हैं लेकिन हरेक दवा का इस्तेमाल मरीज़ की ज़रूरत के मुताबिक़ होता है.
एनेस्थीसिया हमेशा ही मरीज़ को पूरी तरह बेहोश करने के लिए नहीं दिया जाता. बल्कि सर्जरी वाली जगह को ही सुन्न करने के लिए दिया जाता है. इसे रीजनल एनेस्थीसिया कहते हैं. इसे लेने के बाद दर्द का एहसास बिल्कुल नहीं होता.
लेकिन, क्या हो रहा है इसका इल्म होता है. वहीं सेडेटिव लेने के बाद मरीज़ को गहरी नींद आ जाती है. इतनी गहरी नींद की मरीज़ के होश-होवास छीन लेती है. इस गहरी नींद के दौरान उसके साथ क्या होता है उसे कुछ याद नहीं रहता.
एनेस्थीसिया हमारे शरीर में कैसे काम करता है, इसका सटीक जवाब आज भी रिसर्चरों के पास नहीं है. हालांकि मोटे तौर पर कहा जाता है कि ये दिमाग़ में पैदा होने वाले केमिकल जिन्हें न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है, के साथ मिलकर काम करते हैं. ये केमिकल दिमाग़ के अलग-अलग हिस्सों के संपर्क को तोड़ देते हैं, जिससे मरीज़ किसी भी याद की कड़ी को जोड़ नहीं पाता.

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